Gujarat Navratri utsav 2022 नवरात्रि: गरबा बनाने की कला से जामनगर की नयना बनी आत्मनिर्भर

Patrika | 4 days ago | 23-09-2022 | 10:08 am

Gujarat Navratri utsav 2022 नवरात्रि: गरबा बनाने की कला से जामनगर की नयना बनी आत्मनिर्भर

जामनगर. नवरात्र में अब गिनती के दिन ही बचे हैं। जामनगर के बाजार भी अब नए रंग-बिरंगे और आकर्षक गरबों से भर चुके हैं। इन गरबों के बिक्री से कई लोगों के घर का चूल्हा जलता है तो कई इससे अच्छी आमदनी करने में सफल हो रहे हैं। जामनगर की नयना संचाणिया नामक महिला गरबों के निर्माण से जहां महिला सशक्तिकरण का उत्कृष्ट उदाहरण पेश कर रही हैं, तो वह इससे आत्मनिर्भर भी बनीं है। गरबों के जरिए वे दो-तीन महीने में ही अच्छी आमदनी प्राप्त करने में सफल होती हैं। इतना ही नहीं इनके बनाए पारंपरिक और आधुनिक कला के समन्वय वाले गरबों की खूब मांग रहती है। पिछले कुछ सालों से मुख्यमंत्री कार्यालय में इनके बनाए गरबों की ही स्थापना की जा रही है। जामनगर की नयना संचाणिया अपने परिवार के लिए आर्थिक रूप से मददगार साबित होने के लिए गरबा बनाकर उसकी बिक्री करती हैं। अपनी कला का उपयोग कर वह पिछले 15 वर्षों से नवरात्र त्योहार में माताजी की आराधना में इस्तेमाल होने वाले गरबे बनाती हैं। मिट्टी से गरबे बनाकर उसके ऊपर वे रंग की सहायता से अनोखी डिजाइन बनाकर लोगों को आकर्षित करने में सफल हुईं हैं। आरंभ में वह 5 से 7 गरबों का ही निर्माण कर पाती थी। लेकिन, अपनी मेहनत और कला को विकसित कर वह सालाना 500 से 700 गरबे बनाकर बिक्री करती हैं। कीमत 50 रुपए से लेकर एक हजार तकइन गरबों की कीमत 50 रुपए से लेकर एक हजार रुपए तक होती है। नयना बताती हैं कि हिन्दू संस्कृति में गरबों का अत्यंत महत्व है। नवरात्र के दिनों में अमूमन सभी घरों में गरबों की स्थापना का रिवाज है। जो कि माता दुर्गा की आशीर्वाद मानी जाती है। पूर्व में प्रजापति कुम्हार की ओर से गरबे का निर्माण होता था, जो सिर्फ लाल रंग का बनाते थे। लेकिन, लोगों की मांग के अनुरूप उन्होंने कला को विकसित करते हुए 6 डिजाइन में गरबे बनाने शुरू किए। इनमें लाल, गुलाबी, पीला, पर्पल आदि रंगों का इस्तेमाल कर टामेटी घाट, पाटुडी घाट, गागेडी घाट आदि घाटों का गरबा बनाना शुरू किया। जामनगर की प्रख्यात बांधनी कला में आधुनिकता का समन्वय कर बनाए गए गरबों की विशेष मांग होती है। वे बताती हैं कि उन्होंने बचपन से ही गरबा बनाना सीख लिया था। शादी के बाद भी इस कला को जीवित रखते हुए उन्होंने पति तुषार की सहायता से जारी रखा।

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