अरुणाचल प्रदेश और गुजरात के बीच रुक्मणी कृष्ण यात्रा को मिलेगी मजबूती

Patrika | 1 week ago | 22-06-2022 | 08:55 am

अरुणाचल प्रदेश और गुजरात के बीच रुक्मणी कृष्ण यात्रा को मिलेगी मजबूती

गांधीनगर. रुक्मणी और भगवान कृष्ण की कथा से गुजरात व अरुणाचल के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक संबंधों को टूरिस्ट सर्किट से मजबूती प्रदान मिलेगी। इसके लिए अरुणाचल प्रदेश सरकार और राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण (एनएमए) ने कवायद शुरू की है। अरुणाचल प्रदेश के उपमुख्यमंत्री चौना मीन और राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण (एनएमए) के अध्यक्ष तरुण विजय के नेतृत्व में एनएमए के शीर्ष अधिकारियों के बीच एक बैठक हुई, जिसमें यह निर्णय किया गया। गुजरात के लोग करें भीष्मक नगर की यात्रा प्राधिकरण के अध्यक्ष तरुण विजय ने कहा कि इस पर विचार किया गया है कि गुजरात के लोग भीष्मक नगर और भीष्मक नगर के लोग गुजरात का दौरा करें ताकि देश के सुदूर पूर्वी और सुदूर पश्चिमी भागों के बीच सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा मिल सके। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय एकता मिशन और प्रधानमंत्री द्वारा परिकल्पित 'एक भारत श्रेष्ठ भारतÓ को बढ़ावा देना है।एनएमए का उद्देश्य स्मारकों का संरक्षण करना और अरुणाचल प्रदेश व गुजरात के बीच रुक्मिणी कृष्ण यात्रा का आयोजन बड़े पैमाने पर करना और इसको राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा देना है। आदिवासी गीतों में गाई जाती है श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के विवाह की गाथा एनएमए की टीम ने रुक्मिणी महल के पौराणिक भीष्मक नगर खंडहरों का दौरा किया और गांव के कई बुजुर्ग लोगों से मुलाकात की, जिन्होंने उन्हें श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के विवाह की सुंदर गाथा सुनाई, जिसे अभी भी इडु मिश्मी आदिवासी गीतों में गाया जाता है। टीम ने एक इडु मिश्मी नामक लड़की से भी मुलाकात की, जिसके माता-पिता ने उसका नाम रुक्मिणी रखा है। उस लड़की ने उनके लिए स्थानीय रुक्मिणी भीष्मक गीत गाया जिसे विधिवत रूप से रिकॉर्ड किया गया। पोरबंदर में, अरुणाचल की रुक्मिणी के साथ गुजरात के कृष्ण की शादी का उत्सव आज भी मनाया जाता है। गुजरात के सांस्कृतिक संकल्पनाकर्ता रहे मौजूद तरुण विजय ने कहा कि उनके साथ विशेष रूप से गुजरात के वास्तुकार और सांस्कृतिक संकल्पनाकर्ता हेमराज कामदार, और आंध्र प्रदेश के प्रोफेसर कैलाश राव भी आए हैं, जिससे रुक्मिणी-कृष्ण कथा के माध्यम से मिशन राष्ट्रीय एकता की कल्पना को साकार करने में मदद मिल सके। अरुणाचल प्रदेश को अपनी सांस्कृतिक स्मृति का संरक्षण करने की दिशा में बहुत विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को मौखिक रूप से हस्तांतरित किया गया इतिहास तेजी से गायब हो रहा है क्योंकि गांव के बुजुर्ग और इगुस (पारंपरिक चिकित्सक और पुजारी) की संख्या में कमी आ रही है।एनएमए द्वारा इस संवेदनशील सीमावर्ती राज्य के कई स्वदेशी पुरातात्विक स्थलों का दौरा किया गया और वह इस राज्य की मूर्त व अमूर्त सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के लिए एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रहा है।

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